(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.274. अध्यायः 274
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरेण मार्कण्डेयंप्रति स्वसमानदुःखिसत्ताप्रश्नः ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

जनमेजय उवाच। 3-274-0x(2684)(26451)
एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम्।
अत ऊर्द्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ 3-274-1(26452)
वैशम्पायन उवाच। 3-274-2x(2685)
एवं कृष्णां मोक्षयित्वाविनिर्जित्य जयद्रथम्।
आसांचक्रे मुनिगणैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ 3-274-2(26453)
तेषां मध्येमहर्षीणां शृण्वतामनुशोचताम्।
मार्कण्डेयमिदं वाक्यमब्रवीत्पाण्डुनन्दनः ॥ 3-274-3(26454)
भगवन्देवर्षीणां त्वं ख्यातो भूतभविष्यवित्।
संशयं परिपृच्छमि च्छिन्धि मे हृदि संस्थितम् ॥ 3-274-4(26455)
द्रुपदस्य सुता ह्येषा वेदिमध्यात्समुत्थिता।
अयोनिजा महाभागास्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥ 3-274-5(26456)
मन्ये कालश्च भगवान्दैवं च दुरतिक्रमम्।
भवितव्यं च भूतानां यस् नास्ति व्यतिक्रमः ॥ 3-274-6(26457)
कथं हि पत्नीमस्माकं धर्मज्ञां धर्मचारिणीम्।
संस्पृशेदीदृशो भावः शुचिं स्तैन्यमिवानृतम् ॥ 3-274-7(26458)
न हि पापं कृतंकिंचित्कर्म वा निन्दितं क्वचित्।
द्रौपद्या ब्राह्मणेष्वेव धर्मः सुचरितो महान् ॥ 3-274-8(26459)
तां जहार बलाद्राजा मूढबुद्धिर्जयद्रथः।
तस्याः संहरणात्पापः शिरसः केशवापनम् ॥ 3-274-9(26460)
पराजयं च संग्रामे ससहाः समाप्तवान्।
प्रत्याहृता तथाऽस्माभिर्हत्वा तत्सैन्धवं बलम् ॥ 3-274-10(26461)
तद्दारहरणं प्राप्तमस्माभिरवितर्कितम्।
दुःखश्चायं वने वासो मृगयायां च जीविका ॥ 3-274-11(26462)
हिंसा च मृगजातीनां वनौकोभिर्वनौकसाम्।
ज्ञातिभिर्विप्रवासश्च मिथ्याव्यवसितैरियम् ॥ 3-274-12(26463)
अस्ति नूनं मया कश्चिदल्पभाग्यतरो नरः।
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् ॥ 3-274-13(26464)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 274 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-274-6 दैवं च विधिनिर्मितमिति झ. ध. पाठः। तत्रदैवं धर्माधर्मौ विधिः सदसत्कर्मणी ताभ्यां निर्मितम् ॥ 3-274-7 ईदृशो भावः परेण हरणम् ॥ 3-274-12 मिथ्याव्यवसितैः वृथातापसवेषधरैः। इयं हिंसा क्रियत इति शेषः ॥ 3-274-13 मया सम इतिशेषः ॥


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